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वाल्मीकि रामायण 33.5

अयुक्त चारम् दुर्दर्शम् अस्वाधीनम् नराधिपम् ।
वर्जयन्ति नरा दूरात् नदी पंकम् इव द्विपाः ॥३-३३-५॥

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