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वाल्मीकि रामायण 30.7

पांसु रूषित सर्वान्गः स्रस्त न्यस्त भुज द्वयः ।
स्वप्स्यसे गाम् समाश्लिष्य दुर्लभाम् प्रमदाम् इव ॥३-३०-७॥

पूरा अध्याय