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वाल्मीकि रामायण 30.15

काल पाश परिक्षिप्ता भवंति पुरुषा हि ये ।
कार्य अकार्यम् न जानन्ति ते निरस्त षड् इन्द्रियाः ॥३-३०-१५॥

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