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वाल्मीकि रामायण 28.31

छित्त्वा वज्र निकाशेन राघवः प्रहसन् इव ।
त्रयोदशेन इन्द्र समो बिभेद समरे खरम् ॥३-२८-३१॥

पूरा अध्याय