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वाल्मीकि रामायण 26.14

भ्रष्टः तस्य महाकायः पपात रण मूर्धनि ।
परिघः छिन्न हस्तस्य शक्र ध्वज इव अग्रतः ॥३-२६-१४॥

पूरा अध्याय