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वाल्मीकि रामायण 19.2

उत्तिष्ठ तावत् आख्याहि प्रमोहम् जहि संभ्रमम् ।
व्यक्तम् आख्याहि केन त्वम् एवम् रूपा विरूपिता ॥३-१९-२॥

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