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वाल्मीकि रामायण 18.24

सा विक्षरंती रुधिरम् बहुधा घोर दर्शना ।
प्रगृह्य बाहू गर्जन्ती प्रविवेश महावनम् ॥३-१८-२४॥

पूरा अध्याय