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वाल्मीकि रामायण 12.29

अग्निम् हुत्वा प्रदाय अर्घ्यम् अतिथिम् प्रतिपूजयेत् ।
अन्यथा खलु काकुत्स्थ तपस्वी समुदाचरन् ।दुःसाक्षी इव परे लोके स्वानि मांसानि भक्षयेत् ॥३-१२-२९॥

पूरा अध्याय