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वाल्मीकि रामायण 11.78

स्निग्ध पत्रा यथा वृक्षा यथा क्षान्ता मृग द्विजाः ।
आश्रमो न अतिदूरस्थो महर्षेर् भावित आत्मनः ॥३-११-७८॥

पूरा अध्याय