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वाल्मीकि रामायण 10.2

हितम् उक्तम् त्वया देवि स्निग्धया सदृशम् वचः ।
कुलम् व्यपदिशन्त्या च धर्मज्ञे जनक आत्मजे ॥३-१०-२॥

पूरा अध्याय