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वाल्मीकि रामायण 88.8

गीत वादित्र निर्घोषैर् वर आभरण निह्स्वनैः ।
मृदन्ग वर शब्दैः च सततम् प्रतिबोधितः ॥२-८८-८॥

पूरा अध्याय