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वाल्मीकि रामायण 85.4

कतरेण गमिष्यामि भरद्वाज आश्रमम् गुह ।
गहनो अयम् भृशम् देशो गन्गा अनूपो दुरत्ययः ॥२-८५-४॥

पूरा अध्याय