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वाल्मीकि रामायण 77.17

विहीना या त्वया राज्ञा धर्मज्ञेन महात्मना ।
पितरि स्वर्गम् आपन्ने रामे च अरण्यम् आश्रिते ॥२-७७-१७॥

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