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वाल्मीकि रामायण 75.20

आर्ये कस्मात् अजानन्तम् गर्हसे माम् अकिल्बिषम् ।
विपुलाम् च मम प्रीतिम् स्थिराम् जानासि राघवे ॥२-७५-२०॥

पूरा अध्याय