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वाल्मीकि रामायण 74.33

सा त्वमग्निम् प्रविश वा स्वयम् वा दण्डकान्विश ।
रज्जुम् बधान वा कण्ठे न हि तेऽन्यत्परायणम् ॥२-७४-३३॥

पूरा अध्याय