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वाल्मीकि रामायण 72.14

तम् प्रत्युवाच कैकेयी प्रियवद् घोरम् अप्रियम् ।
अजानन्तम् प्रजानन्ती राज्य लोभेन मोहिता ॥२-७२-१४॥

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