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वाल्मीकि रामायण 67.31

न अराजके जन पदे स्वकम् भवति कस्यचित् ।
मत्स्याइव नरा नित्यम् भक्षयन्ति परस्परम् ॥२-६७-३१॥

पूरा अध्याय