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वाल्मीकि रामायण 66.1

तम् अग्निम् इव सम्शान्तम् अम्बु हीनम् इव अर्णवम् ।
हतप्रभम् इव आदित्यम् स्वर्गथम् प्रेक्ष्य भूमिपम् ॥२-६६-१॥

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