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वाल्मीकि रामायण 65.24

न बभ्राज रजो ध्वस्ता तारा इव गगन च्युता ।
नृपे शान्तगुणे जाते कौसल्याम् पतिताम् भुवि ॥२-६५-२४॥

पूरा अध्याय