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वाल्मीकि रामायण 63.52

सम्स्तभ्य धैर्येण स्थिरचित्तो भवाम्यहम् ।
ब्रह्महत्याकृतम् पापम् हृदयादपनीयताम् ॥२-६३-५२॥

पूरा अध्याय