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वाल्मीकि रामायण 63.22

निपाने महिषम् रात्रौ गजम् वा अभ्यागतम् नदीम् ।
अन्यम् वा श्वा पदम् कम्चिज् जिघाम्सुर् अजित इन्द्रियः ॥२-६३-२२॥

पूरा अध्याय