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वाल्मीकि रामायण 58.6

दुःखस्यानुचितो दुःखम् सुमन्त्र शयनोचितः ।
भूमि पाल आत्मजो भूमौ शेते कथम् अनाथवत् ॥२-५८-६॥

पूरा अध्याय