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वाल्मीकि रामायण 58.36

उद्वीक्षमाणा भर्तारम् मुखेन परिशुष्यता ।
मुमोच सहसा बाष्पम् माम् प्रयान्तम् उदीक्ष्य सा ॥२-५८-३६॥

पूरा अध्याय