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वाल्मीकि रामायण 58.32

सर्व लोक प्रियम् त्यक्त्वा सर्व लोक हिते रतम् ।
सर्व लोको अनुरज्येत कथम् त्वा अनेन कर्मणा ॥२-५८-३२॥

पूरा अध्याय