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वाल्मीकि रामायण 54.14

भार्या मम इयम् वैदेही कल्याणी जनक आत्मजा ।
माम् च अनुयाता विजनम् तपो वनम् अनिन्दिता ॥२-५४-१४॥

पूरा अध्याय