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वाल्मीकि रामायण 53.28

विलप्य उपरतम् रामम् गत अर्चिषम् इव अनलम् ।
समुद्रम् इव निर्वेगम् आश्वासयत लक्ष्मणः ॥२-५३-२८॥

पूरा अध्याय