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वाल्मीकि रामायण 52.58

भृत्य वत्सल तिष्ठन्तम् भर्तृ पुत्र गते पथि ।
भक्तम् भृत्यम् स्थितम् स्थित्याम् त्वम् न माम् हातुम् अर्हसि ॥२-५२-५८॥

पूरा अध्याय