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वाल्मीकि रामायण 52.55

न हि शक्या प्रवेष्टुम् सा मया अयोध्या त्वया विना ।
राज धानी महा इन्द्रस्य यथा दुष्कृत कर्मणा ॥२-५२-५५॥

पूरा अध्याय