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वाल्मीकि रामायण 51.16

अनुरक्त जन आकीर्णा सुख आलोक प्रिय आवहा ।
राज व्यसन सम्सृष्टा सा पुरी विनशिष्यति ॥२-५१-१६॥

पूरा अध्याय