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वाल्मीकि रामायण 50.4

ततो रुधिरताम्राक्षो भुजमुद्यम्य दक्षिणम् ।
अश्रुपूर्णमुखो दीनोऽब्रवीज्जानपदम् जनम् ॥२-५०-४॥

पूरा अध्याय