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वाल्मीकि रामायण 5.13

सुहृद्भिस्तत्र रामोऽपि सहासीनः प्रियंवदैः ।
सभाजितो विवेशाथ ताननुज्ञाप्य सर्वशः ॥२-५-१३॥

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