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वाल्मीकि रामायण 49.16

न अत्यर्थम् अभिकान्क्षामि मृगयाम् सरयू वने ।
रतिर् हि एषा अतुला लोके राज ऋषि गण सम्मता ॥२-४९-१६॥

पूरा अध्याय