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वाल्मीकि रामायण 47.14

रथस्य मार्ग नाशेन न्यवर्तन्त मनस्विनः ।
किम् इदम् किम् करिष्यामः दैवेन उपहताइति ॥२-४७-१४॥

पूरा अध्याय