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वाल्मीकि रामायण 45.8

ज्ञान वृद्धो वयो बालो मृदुर् वीर्य गुण अन्वितः ।
अनुरूपः स वो भर्ता भविष्यति भय अपहः ॥२-४५-८॥

पूरा अध्याय