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वाल्मीकि रामायण 44.27

अभिवादयमानम् तम् दृष्ट्वा ससुहृदम् सुतम् ।
मुदा अश्रु मोक्ष्यसे क्षिप्रम् मेघ लेका इव वार्षिकी ॥२-४४-२७॥

पूरा अध्याय