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वाल्मीकि रामायण 44.25

त्वया शेषोओ जनश्चैव समाश्वास्यो यदाऽनघे ।
किमिदानीमिदम् देवि करोषि हृदि विक्लबम् ॥२-४४-२५॥

पूरा अध्याय