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वाल्मीकि रामायण 34.25

प्रतीक्षमाणम् अव्यग्रम् अनुज्ञाम् जगती पतेः ।
उवाच रर्जा सम्प्रेक्ष्य वन वासाय राघवम् ॥२-३४-२५॥

पूरा अध्याय