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वाल्मीकि रामायण 30.15

पत्रम् मूलम् फलम् यत् त्वम् अल्पम् वा यदि वा बहु ।
दास्यसि स्वयम् आहृत्य तन् मे अमृत रस उपमम् ॥२-३०-१५॥

पूरा अध्याय