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वाल्मीकि रामायण 19.37

उचितम् च महाबाहुर्न जहौ हर्षमात्मनः ।
शारदः समुदीर्णाम्शुश्चन्द्रस्तेज इवात्मजम् ॥२-१९-३७॥

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