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वाल्मीकि रामायण 14.67

निर्जगाम महाबाहो राघवस्य दिदृक्षया ।
सागरह्रदसंकाशात्सुमन्त्रोऽन्तःपुराच्छुभात् ॥२-१४-६७॥

पूरा अध्याय