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वाल्मीकि रामायण 14.57

यथा च्न्द्रं विना रात्रिर्यथा गावो विना वृषम् ।
एवं हि भविता राष्ट्रं यत्र राजा न दृश्यते ॥२-१४-५७॥

पूरा अध्याय