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वाल्मीकि रामायण 12.55

नष्टचित्तो यथोन्मत्तो विपरीतो यथातुरः ।
हृततेजा यथा सर्पो बभूव जगतीपतिः ॥२-१२-५५॥

पूरा अध्याय