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वाल्मीकि रामायण 100.63

कच्चिदर्थेन वा धर्ममर्थं धर्मेण वा पुनः ।
उभौ वा प्रीतिलोभेन कामेन च न बाधसे ॥ २.१००.६३॥

पूरा अध्याय