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वाल्मीकि रामायण 100.57

कच्चिदार्य्यो विशुद्धात्मा ऽ ऽक्षारितश्चोरकर्मणा ।
अपृष्टः शास्त्रकुशलैर्न लोभाद्वध्यते शुचिः ॥ २.१००.५७॥

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