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वाल्मीकि रामायण 100.20

कच्चिदर्थं विनिश्चित्य लघुमूलं महोदयम् ।
क्षिप्रमारभसे कर्त्तुं न दीर्घयसि राघव ॥ २.१००.२०॥

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