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वाल्मीकि रामायण 100.15

इष्वस्त्रवरसम्पन्नमर्थशास्त्रविशारदम् ।
सुधन्वानमुपाध्यायं कच्चित्त्वं तात मन्यसे ॥ २.१००.१५॥

पूरा अध्याय