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वाल्मीकि रामायण 1.24

दृढभक्तिः स्थिरप्रज्ञो नासद्ग्राही न दुर्वचाः ।
निस्तन्द्रिरप्रमत्तश्च स्वदोषपरदोषवित् ॥२-१-२४॥

पूरा अध्याय