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वाल्मीकि रामायण 74.18

कैलासम् इव दुर्धर्षम् काल अग्निम् इव दुःसहम् ।
ज्वलंतम् इव तेजोभिः दुर् निरीक्ष्यम् पृथक् जनैः ॥१-७४-१८॥

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