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वाल्मीकि रामायण 67.16

पश्यताम् नृ सहस्राणाम् बहूनाम् रघुनंदनः ।
आरोपयत् स धर्मात्मा स लीलम् इव तत् धनुः ॥१-६७-१६॥

पूरा अध्याय