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वाल्मीकि रामायण 65.3

पूर्णे वर्ष सहस्रे तु काष्ठ भूतम् महामुनिम् ।
विघ्नैः बहुभिः आधूतम् क्रोधो न अंतरम् आविशत् ॥१-६५-३॥

पूरा अध्याय